वंदे मातरम् 150 वर्ष-' स्वर से स्वाधीनता तक’ कार्यक्रम आयोजित, इतिहास, साहित्य, संगीत और राष्ट्रचेतना पर हुआ मंथन
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✍ सर्च इंडिया न्यूज डॉट कॉम, रतलाम।
राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर सक्षम संचार फाउंडेशन द्वारा संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से रतलाम में पहली बार ‘वंदे मातरम् 150 वर्ष-स्वर से स्वाधीनता तक’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित इस कार्यक्रम में इतिहास, साहित्य, संगीत, शिक्षा, पत्रकारिता और संस्कृति के विशेषज्ञों के साथ रतलाम शहर की विभिन्न संस्थाओं, विद्यालयों के विद्यार्थियों एवं युवाओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
कार्यक्रम का उद्देश्य ‘वंदे मातरम्’ की 150 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा को स्मरण करने के साथ यह समझना रहा कि किस प्रकार एक गीत स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीय चेतना का स्वर बना और आज की पीढ़ी के लिए उसके क्या अर्थ और संदेश हैं।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध साहित्यकार इंदु शेखर तत्पुरुष ने ‘आनंदमठ’ और ‘वंदे मातरम्’ की 150 वर्षों की यात्रा पर विशेष चर्चा करते हुए बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की साहित्यिक दृष्टि तथा भारतीय सांस्कृतिक चेतना में ‘वंदे मातरम्’ के प्रभाव को रेखांकित किया। अध्यक्षता करते हुए राजा मानसिंह संगीत एवं कला विश्वविद्यालय ग्वालियर की कुलगुरू व प्रसिद्ध संगीतज्ञ डॉ. स्मिता सहस्त्रबुद्धे कुलगुरू ने संगीत और कला के दृष्टिकोण से ‘वंदे मातरम्’ की यात्रा और उसकी भावनात्मक शक्ति पर विचार रखते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम्’ केवल शब्द और स्वर नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक स्मृति है। विशिष्ट अतिथि सांदीपनी विद्यालय रतलाम के उपप्राचार्य व शिक्षाविद् गजेंद्र सिंह राठौर ने कहा कि स्वर से स्वाधीनता तक’ केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इतिहास, साहित्य, संगीत, संस्कृति और नई पीढ़ी के बीच संवाद स्थापित करने का एक सार्थक प्रयास है। 150 वर्षों की यह यात्रा हमें स्मरण कराती है कि राष्ट्रगीत केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान के दायित्व और भविष्य के भारत के निर्माण की प्रेरणा है।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण वंदे मातरम् – 150 वर्ष : संगीत, साहित्य और समाज’ विषय पर आयोजित पैनल डिस्कशन रहा। इसमें भारतीय राष्ट्रवाद, ‘आनंदमठ’ और सांस्कृतिक पुनर्जागरण, भारतीय भाषाओं में ‘वंदे मातरम्’, शिक्षा एवं राष्ट्रीय मूल्य तथा युवाओं की राष्ट्रीय जिम्मेदारी जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। डॉ. स्मिता सहस्रबुद्धे ने समाज के निर्माण और साहित्य के सृजन में संगीत के प्रभाव को रेखांकित किया। वहीं बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के पूर्व कुलपति डॉ प्रकाश बरतुनिया, ने कहा कि राष्ट्रनिर्माण केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि उन विचारों और मूल्यों से होता है जो नागरिकों में अपने देश और समाज के प्रति दायित्व का बोध उत्पन्न कराते हैं। पैनल डिस्कशन में वरिष्ठ पत्रकार अमन व्यास, भारत भारती के राष्ट्रीय सह कोषाध्यक्ष शिरीष गोधे (पुणे) एवं भाषाविद डॉ. हरिमोहन बुधोलिया (उज्जैन) सहित विषय विशेषज्ञों ने सहभागिता की। पैनल चर्चा का संचालन सांई श्री इंटरनेशनल एकेडमी की प्राचार्या डॉ. श्वेता विंचुरकर ने किया। कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ की ऐतिहासिक यात्रा एवं महत्व पर आधारित युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्पद फिल्म आजादी प्रदर्शित की गई।
विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन
भारती दीक्षित ने ‘वंदे मातरम्’ पर विशेष गाथा प्रस्तुत की, जिसमें कहानी, भाव और प्रभावी प्रस्तुति के माध्यम से राष्ट्रगीत की ऐतिहासिक एवं भावनात्मक यात्रा को दर्शकों के समक्ष जीवंत चित्रण किया गया। कार्यक्रम में विद्यालयों के लिए ‘मेरे सपनों का भारत’ विषय पर स्लोगन, निबंध लेखन एवं चित्रकला प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। विद्यार्थियों ने अपने सपनों के भारत की कल्पना को शब्दों, विचारों और रंगों के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। इन प्रस्तुतियों में राष्ट्रनिर्माण, भारतीय संस्कृति, स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रीय एकता और युवा दायित्व जैसे विषय प्रमुख रहे। प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को अतिथियों द्वारा मेडल एवं प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के प्रारंभ में लगभग 550 विद्यार्थियों द्वारा ‘वंदे मातरम्’ का सामूहिक गायन किया गया। कार्यक्रम में डॉ. प्रवीणा दवेसर, एडवोकेट अदिति दवेसर, सरस्वती शिशु की प्राचार्या वत्सला रुनवाल भी उपस्थित रहे। संचालन रवींद्र उपाध्याय ने किया। आभार सक्षम संचार फाउंडेशन की अध्यक्ष डॉ. अर्चना शर्मा ने माना।