श्री श्री 1008 संत श्री मंगलदास जी महाराज के अंतिम दर्शन के लिए उमड़ा जनसैलाब

कई गांवों व नगरों से होकर निकली अंतिम यात्रा, हजारों श्रद्धालुओं ने किए अंतिम दर्शन

श्री श्री 1008 संत श्री मंगलदास जी महाराज के अंतिम दर्शन के लिए उमड़ा जनसैलाब
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सर्च इंडिया न्यूज, रतलाम।
महू- नीमच हाइवे पर रतलाम से 41 व जावरा से करीब छह किलोमीटर दूर रूपनगर फंटा के पास  स्थित श्री हनुमान मंदिर के  श्री श्री 1008  संत श्री मंगलदास जी महाराज गुरुवार सुबह आरती के बाद प्रभु नाम जपते हुए ही ब्रह्मलीन हो गए। उनके ब्रह्मलीन होने की खबर से रूपनगर व आसपास के गांवों के साथ ही जावरा, खाचरोद, नामली, ग्राम रिंगनिया, बोरदिया, बरबोदना, सेमलिया सहित अनेक नगरों व गांवों में शोक की  लहर दौड़ गई। शाम को उनका अंतिम संस्कार किया गया।

       जानकारी के अनुसार कुछ ही देर में उनके ब्रह्मलीन होने की खबर तेजी से फैली। नामली, जावरा, खाचरोद,  नामली,  मंदसौर, उज्जैन, रतलाम, सेमलिया, बरबोदना, बोरदिया सहित अनेक  दूर-दराज के नगरों वो गांवों से हजारों गुरु भक्त व श्रद्धालु उनके अंतिम दर्शन के लिए रूपनगर पहुंचे। अंतिम दर्शन के लिए जनसैलाब उमड़ने से महू-नीमच हाईवे पर नामली से लेकर रूपनगर तक भक्तों का सैलाब ही दिखाई दे रहा था। वाहनों में सवार भक्तों के अलावा हजारों भक्त उनके अंतिम दर्शन के लिए कई किलोमीटर दूर तक संत पैदल ही दौड़ते-भागते रहे।रतलाम जिले का नामली नगर और ग्राम सेमलिया स्वेच्छा से पूरी तरह बंद रहा। सुबह से ही सभी धर्मों के लोगों ने अपने प्रतिष्ठान व दुकानें स्वेच्छा से बंद रखी। उनकी अंतिम यात्रा रूपनगर फंटे से निकाली गई। रूपनगर से उनकी अंतिम यात्रा निकाली गई, जो जावरा,  खाचरोद, ग्राम रिंगनिया, बोरदिया, बरबोड़ना, सेमलिया, नामली, हसनपालिया, चौरासी बडायला फंटा होते हुए पुनः रूपनगर पहुंची, जहां शाम को उनका अंतिम संस्कार किया गया।  
                12 वर्ष की आयु में ले लिया था सन्यास 
  भक्तों के अनुसार श्री श्री 1008 संत श्री मंगलदास जी महाराज मूलत: उज्जैन जिले की खाचरौद तहसील के ग्राम बोरदिया के रहने वाले थे। उनका जीवन पूर्णत: प्रभु भक्ति को समर्पित रहा। बचपन से ही वे एकांत में बैठकर श्रीराम और हनुमान चालीसा का जाप करते थे। मात्र करीब 12  वर्ष की आयु में वे घर छोड़कर अयोध्या चले गए, जहां उन्होंने गुरु रामधुनी महाराज को अपना आदर्श मानकर सेवा का व्रत लिया था। 
                   प्रकृति के सानिध्य में ही रहे 
     भक्तों ने बताया कि  उन्होंने मालवा की भूमि को ही अपना कर्म और भक्ति का स्थल चुना। विशेष बात यह है कि वे जीवन पर्यंत प्रकृति से जुड़े रहे। वे पक्के स्थल में ना तो रहे ना ही कभी यज्ञ किया। जंगल और खुले स्थानों में ही रहकर वे भक्ति और प्रकृति के संरक्षण का संदेश देते रहे। बताया जाता है कि उन्हें रियासत से जुड़े लोगों और अनेक मंदिर समितियों की तरफ से सुविधा भी कई बार दी गई जिसे उन्होंने कभी नहीं अपनाया। उन्होंने लाखों लोगों तक धर्म और भक्ति का संदेश पहुंचाया ।